Monday, December 29, 2014

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मेरी पड़ोस की लड़की ने उस लड़की से मेरे मित्र का मौखिक संदेश दे दिया ।  उस लड़की ने कहा नहीं, उसके खानदान में ये नहीं होता। वो इस चक्कर में पड़ी तो उसके परिवार वाले तो उस को मार कर जमीन में गाड़ देंगे। मेने अपने मित्र को कहा की वो लड़की ठीक कह रही है तुम उससे दूर ही रहो। मेरा मित्र मेरी बात मान गया क्योंकि मेरा मित्र भी ये नहीं चाहता था की उस लड़की की इज़्ज़त पर आंच आये हो और मेरा मित्र ये भी नहीं चाहता था की जिस लड़की से वो बहुत प्यार करता था उसकी बदनामी हो और कोई उस लड़की पर ऊँगली उठाये। एक तरफा प्यार था क्योंकि उस लड़की को आजतक भी पता नहीं है की  मेरी पड़ोस की लड़की ने उस लड़की को किस लड़के का संदेश दिया था।      

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मंदिर में प्रसाद चढाने के लिए जाना और प्रसाद चढ़ा कर वापिस आना बहुत रौनक दिखती थी।  चाय  पकोड़ी, टिक्की, गोल गप्पे, भल्ले पापड़ी, मिठाई खा कर बहुत  मज़ा आता था।  तरह तरह की दुकाने और तरह तरह के झूले झूलने में बहुत मज़ा आता था। इस जलुश में नये-पुराने मित्रों से भेंट तो पक्की थी। रिश्तेदार भी इस जलूस में जरूर मिलते थे।    सारी सड़क पर बहुत भीड़  होती थी।  सड़क के दोनों और लोग-महिला युवक युवती  जलूस देखने के लिए कई घंटों पहले ही अपनी जगह घेर कर बैठ जाते थे। परिवार के सभी लोग ऐसे सजते थे जैसे किसी शादी में जा रहे हों।  युवक युवती तो ऐसे सजते थे जैसे फैशन शो में जा रहे हों। लालकिले से लेकर  पंचकुईयाँ रोड तक जगह जगह घरों और सड़क को बिजली के बल्बों की लड़ियों से सजाया गया था। 

गुरु जी के जन्म दिन पर हलवा चने पूरी खूब खाने को मिलता था। नेता रत्न लाल जी सबसे चंदा लेकर प्रसाद बटवाता था। मेरे मित्र के पिताजी तो हर वर्ष अपने खुद के रुपयों से कीर्तन करते और जलूस में आने वालों को खुद अपने हाथों से बनाया हुआ हलवा छोले पूरी बांटते थे।  
मेरे एक मित्र  ने इस जलूस में एक लड़की को देखा जो बहुत खूबसूरत थी। मेरे मित्र को ये लड़की इतनी भा गई वो उस लड़की से प्यार करने लगा। उन दिनों लड़के लड़कियां की परवरिश इस तरह से की जाती थी की प्यार-व्यार के चक्कर से दूर रहें। लड़की घर की इज्जत होती थी । लडकियां ये चाहती थी की उनकी वजह से माता-पिता भाई-बहन और परिवार का सिर न झुके। माता-पिता भाई-बहन और परिवार इज्जत के साथ सिर उठा के जिये। 
मेरी पड़ोस की एक लड़की उस लड़की की क्लास में पढ़ती थी। मेरा मित्र प्रतिदिन मेरे से निवेदन करता था  की मै अपनी पड़ोस की लड़की  के द्वारा उस लड़की को खबर कर दूँ की मेरा मित्र उस लड़की से प्यार करता था। मै इन पचड़ों में पड़ना नहीं चाहता था। मेरा मित्र कई वर्ष तक मेरे से मदद मांगता रहा। बहुत समझाने पर भी जब वो नहीं माना  तो एक दिन मेने अपनी पड़ोस की लड़की से उस मित्र का मौखिक सन्देश उस लड़की को भिजवा दिया।  

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पंचकुईयाँ के पहाड़ पर कश्मीर बस्ता था। अनोखा शहर था। सब  एक दूसरे से लगाव और प्यार था। सब एक दूसरे की ईज्जत करते थे। सब सुख-दुःख में एक दूसरे के काम आते थे।  परचून/राशन की दुकान , आलू टमाटर सब्जी मंडी,  मीट की दूकान और हर समय मेला सा लगा रहता था   पंचकुईयाँ के पहाड़ पर।  सारी पहाड़ी पर लाखों छोटे छोटे घर बने हुए थे। घरों में टीवी नहीं होते थे परिवार के सभी लोग एक सरकारी सेंटर में टीवी पर फिल्म  और चित्रहार देखते थे।  महीने में एक -दो बार सरकारी प्रोजेक्टर से बढ़िया -बढ़िया फिल्म भी दिखाई जाती थी। यहाँ नगर पालिका का एक स्कूल था। पंचकुईयाँ के सभी बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते थे। मै और मेरे मित्र पंचकुईयाँ की इस पहाड़ी से बेर  तोड़ कर भी खाते थे।  

यहाँ   गुरु जी का जन्म दिन  बहुत धूम धाम से मनाया जाता था। गुरु जी के जन्म दिन पर सारे दिल्ली और सारे भारत के लोग यहाँ आते थे। यहाँ के मंदिर, बसिंदो  और पहाड़ ने वो सब भी देखा था  जब  भारत को आज़ाद करने के लिए नेता लोग यहाँ ढोंग  रचते थे। मंदिर, बसिंदो  और पहाड़  ने ब्रिटेन के बड़े बड़े राजा महाराजाओं को यहाँ के चक्कर काटते हुए भी देखा था। वर्ष 1970  में, मैं छोटा था।  पहली बार गुरु जी का जन्म दिन देखा था बहुत मज़ा आया था। तरह तरह की झांकियां, ढोल ,तासे ,  तरह तरह के बैण्ड बाजे, सरदारों के  जलूस की तरह इस जलूस में भी  नौजवान लाठी घुमा कर खेल दिखाते थे युवकों की टोली भांगड़ा डांस करती थी ।  बढ़िया झांकी को मेडल/इनाम और सर्टिफिकेट भी दिया जाता था। लाठी का खेल करने वाले युवकों को तथा भांगड़ा करने वाले युवकों को  मेडल/इनाम/सर्टिफिकेट  दिया जाता था 

 मेरे बहुत मित्र यहाँ  रहते थे। हम सब मिल कर हर त्यौहार को उल्लास के साथ मनाते  थे।  समय बीतता गया और पता भी नहीं चला कब हम जवान हो गए। गुरु जी का जन्म दिन था सारे पहाड़ के घरों को  बिजली के बल्ब की लड़ियों से सजाया गया था।  मंदिर को भी खूब सजाया गया था।