पंचकुईयाँ के पहाड़ पर कश्मीर बस्ता था। अनोखा शहर था। सब एक दूसरे से लगाव और प्यार था। सब एक दूसरे की ईज्जत करते थे। सब सुख-दुःख में एक दूसरे के काम आते थे। परचून/राशन की दुकान , आलू टमाटर सब्जी मंडी, मीट की दूकान और हर समय मेला सा लगा रहता था पंचकुईयाँ के पहाड़ पर। सारी पहाड़ी पर लाखों छोटे छोटे घर बने हुए थे। घरों में टीवी नहीं होते थे परिवार के सभी लोग एक सरकारी सेंटर में टीवी पर फिल्म और चित्रहार देखते थे। महीने में एक -दो बार सरकारी प्रोजेक्टर से बढ़िया -बढ़िया फिल्म भी दिखाई जाती थी। यहाँ नगर पालिका का एक स्कूल था। पंचकुईयाँ के सभी बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते थे। मै और मेरे मित्र पंचकुईयाँ की इस पहाड़ी से बेर तोड़ कर भी खाते थे।
यहाँ गुरु जी का जन्म दिन बहुत धूम धाम से मनाया जाता था। गुरु जी के जन्म दिन पर सारे दिल्ली और सारे भारत के लोग यहाँ आते थे। यहाँ के मंदिर, बसिंदो और पहाड़ ने वो सब भी देखा था जब भारत को आज़ाद करने के लिए नेता लोग यहाँ ढोंग रचते थे। मंदिर, बसिंदो और पहाड़ ने ब्रिटेन के बड़े बड़े राजा महाराजाओं को यहाँ के चक्कर काटते हुए भी देखा था। वर्ष 1970 में, मैं छोटा था। पहली बार गुरु जी का जन्म दिन देखा था बहुत मज़ा आया था। तरह तरह की झांकियां, ढोल ,तासे , तरह तरह के बैण्ड बाजे, सरदारों के जलूस की तरह इस जलूस में भी नौजवान लाठी घुमा कर खेल दिखाते थे युवकों की टोली भांगड़ा डांस करती थी । बढ़िया झांकी को मेडल/इनाम और सर्टिफिकेट भी दिया जाता था। लाठी का खेल करने वाले युवकों को तथा भांगड़ा करने वाले युवकों को मेडल/इनाम/सर्टिफिकेट दिया जाता था
मेरे बहुत मित्र यहाँ रहते थे। हम सब मिल कर हर त्यौहार को उल्लास के साथ मनाते थे। समय बीतता गया और पता भी नहीं चला कब हम जवान हो गए। गुरु जी का जन्म दिन था सारे पहाड़ के घरों को बिजली के बल्ब की लड़ियों से सजाया गया था। मंदिर को भी खूब सजाया गया था।