मंदिर में प्रसाद चढाने के लिए जाना और प्रसाद चढ़ा कर वापिस आना बहुत रौनक दिखती थी। चाय पकोड़ी, टिक्की, गोल गप्पे, भल्ले पापड़ी, मिठाई खा कर बहुत मज़ा आता था। तरह तरह की दुकाने और तरह तरह के झूले झूलने में बहुत मज़ा आता था। इस जलुश में नये-पुराने मित्रों से भेंट तो पक्की थी। रिश्तेदार भी इस जलूस में जरूर मिलते थे। सारी सड़क पर बहुत भीड़ होती थी। सड़क के दोनों और लोग-महिला युवक युवती जलूस देखने के लिए कई घंटों पहले ही अपनी जगह घेर कर बैठ जाते थे। परिवार के सभी लोग ऐसे सजते थे जैसे किसी शादी में जा रहे हों। युवक युवती तो ऐसे सजते थे जैसे फैशन शो में जा रहे हों। लालकिले से लेकर पंचकुईयाँ रोड तक जगह जगह घरों और सड़क को बिजली के बल्बों की लड़ियों से सजाया गया था।
गुरु जी के जन्म दिन पर हलवा चने पूरी खूब खाने को मिलता था। नेता रत्न लाल जी सबसे चंदा लेकर प्रसाद बटवाता था। मेरे मित्र के पिताजी तो हर वर्ष अपने खुद के रुपयों से कीर्तन करते और जलूस में आने वालों को खुद अपने हाथों से बनाया हुआ हलवा छोले पूरी बांटते थे।
मेरे एक मित्र ने इस जलूस में एक लड़की को देखा जो बहुत खूबसूरत थी। मेरे मित्र को ये लड़की इतनी भा गई वो उस लड़की से प्यार करने लगा। उन दिनों लड़के लड़कियां की परवरिश इस तरह से की जाती थी की प्यार-व्यार के चक्कर से दूर रहें। लड़की घर की इज्जत होती थी । लडकियां ये चाहती थी की उनकी वजह से माता-पिता भाई-बहन और परिवार का सिर न झुके। माता-पिता भाई-बहन और परिवार इज्जत के साथ सिर उठा के जिये।
मेरी पड़ोस की एक लड़की उस लड़की की क्लास में पढ़ती थी। मेरा मित्र प्रतिदिन मेरे से निवेदन करता था की मै अपनी पड़ोस की लड़की के द्वारा उस लड़की को खबर कर दूँ की मेरा मित्र उस लड़की से प्यार करता था। मै इन पचड़ों में पड़ना नहीं चाहता था। मेरा मित्र कई वर्ष तक मेरे से मदद मांगता रहा। बहुत समझाने पर भी जब वो नहीं माना तो एक दिन मेने अपनी पड़ोस की लड़की से उस मित्र का मौखिक सन्देश उस लड़की को भिजवा दिया।
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